November 17, 2018

रेखाचित्र

गुलाम साबिर
-निर्देश निधि
गुलाम साबिर अपनी पूर्ण उद्विग्नता के साथ संगीत के उन दो घंटों की प्रतीक्षा करता जिनमें उसे अपने हाथ से उस कलाहीन लाठी को छोड़कर एक पतले लंबे और एक मोटे वृत्ताकार तबले का स्वामित्व संभालना होता। उम्र रही होगी कोई चालीस पैंतालीस बरस। लंबी कद काठी , थोड़ा मोटा थुलथुला शरीर,गहरी काली आँखें, भारी आवाज़, छोटेछोटे बाल और झूमती हुई सी चाल। हाथ में मोटी घी पिलाई हुई सी लाल हो गई लाठी। रोज़ एक ही पहनावा, पीला हुआ सा ढीला सफ़ेद कुर्ता और उसी के अनुपात में पीला पड़ा सफ़ेद पाजामा। संगीत की  कक्षा शुरू होते ही उसकी उँगलियों का जादू तबलों पर तैरने लगता। विद्यालय के प्रांगण को स्वर्गीय सुख देने लगताउसकी सधी हुई उँगलियों की कठपुतली तबलों से निकलती मधुर तान सुबहसुबह ही विद्यालय के शांत नीरव परिसर के कण- कण को सुप्रभात बोलकर जैसे जगाती फिरती। संगीत के उन प्राणदाई से दो घंटों के दौरान स्वयं के संगीत न लेने का पश्चाताप मुझे निरंतर सालता रहता और अपना पसंदीदा विषय नीरसतम प्रतीत होता। लगता कि बस संगीत ही दुनिया का सर्वोत्तम विषय और तबला ही दुनिया का सर्वोत्तम वाद्य हो। वह बिजनौर के रानी भाग्यवती महिला महाविद्यालय में चपरासी था। विद्यालय प्रबंधन को निष्ठुर कहें या अज्ञानी या भेद भाव से भरा बूढ़ा खूसट दृष्टिहीन जिसे गुण की परख ही न थी। एक सिद्धहस्त कलाकार को बतौर चपरासी रख छोड़ा था। और उसके तबला वादन के लिए कोई अतिरिक्त वेतन भी नहीं था। परंतु उसके चेहरे पर तनिक भी शिकन कभी नहीं देखी।
स्त्री पुरुष के भेद भाव वाले समाज में वह भी भेदभाव करता,पर उसका भेदभाव लड़कों के खिलाफ हम लड़कियों का पक्ष लेता। हमारे विद्यालय के निकट ही एक इंटर कॉलेज था जहाँ के किशोर लड़के, हम लड़कियों का पीछा करते हमारे विद्यालय के गेट तक चले आते। गुलाम साबिर की मोटी कलाहीन लाठी तब काम आती लंबा तड़ंगा गुलाम साबिर उस लाठी को लेकर ऐसे खड़ा होता जैसे वाघा बार्डर पर हमारे बहादुर सिपाही खड़े रहते हैं बिना पलक झपकाए ताकि शत्रु आँख से आँख मिलाने का साहस भी न कर पाए। लड़के रिक्शा वालों से रिक्शा ले लेते और हम लड़कियों से पूछते- 
''कहाँ जाना है, खाली है रिक्शा''
वह बिना कोई देर किए अपनी उस प्रसिद्ध लाठी के साथ आ पहुँचता और कहता, ''जो लच्छन हैं तुम्हारे, तुम यही करने लायक  बन सकोगे बस।''
उस अकेले को देखते ही लड़कों की भीड़ तुरंत से पहले गायब हो जाती। जब तक हमे वो रिक्शा में या पैदल सुरक्षित दूर तक जाते नहीं देख लेता उसकी निगाह न उन उद्दंड लड़कों पर से हटती और ना हम पर से। जैसे कोई किसान अपनी नई फसल को जानवरों से बचाता हो वैसे ही वो हमारी रखवाली करता। कुल मिलाकर हमें उसमें अपने बड़े भाई और कभीकभी अपने पिता के भी दर्शन हो जाते। एक चपरासी को आखिर क्या आवश्यकता हो सकती थी हम लड़कियों की इतनी ज़िम्मेदारी लेने की, हम कुछ विचारशील लड़कियां अकसर सोचतीं। सच तो यह है कि गुलाम साबिर कभी चपरासी जैसा था ही नहीं। वह हम सबके लिए अभिभावक की तरह था। 
हमारी एनसीसी की कक्षाएँ और ड्रिल एकदम सुबह सुबह होतीं चाहे जाड़े गर्मी बरसात या कुछ भी हो। भारतीय सेना से आए हमारे इंस्ट्रक्टर सेना सरीखे अनुशासन का पालन करते हमारे लड़कियां होने का तरस उन्होंने ने हम पर कभी नहीं खाया, खाना ही क्यों चाहिए। भला, देश पर संकट के समयहम कमीशन लेकर सेना में काम करने के योग्य जो बनने जा रहे थे । हम सब लड़कियों को अपने अपने साधनों पर सवार हो यूनिफॉर्म और बूट पहन कर सुबह  ही सुबह निकालना होता घर से । मुझे अकसर छोटे भैया अपनी मोटर बाइक द्वारा छोड़ देते परंतु किसी दिन भैया कहीं बाहर गए होते या उनकी बाइक कोई और ले गया होता तो भैया अपना रटा रटाया जुमला छोड़ते,
''राजकुमारी जी कभीकभी खुद भी जाने का कष्ट किया करोआखिर एन सी सी की ट्रेनिंग के लिए जाती हो किसी  नाटक घर नहीं।''
और मैं देश की भावी रक्षक सी खुद ही चल पड़ती। जनवरी की एक सुबह कोहरे ने हमारे बिजनौर शहर को कुछ यूं ढाँपा हुआ था जैसे माँ अपने बच्चों को किसी बला से बचाने के लिए अपने ममतामयी आँचल में छुपा ले। उस दिन भैया मुझे कॉलेज छोड़ने के लिए उपलब्ध नहीं थे। इतनी सर्दी भरे कोहरे की सुबह में कोई रिक्शा भी नहीं मिला। न कोई सखी सहेली ही नसीब हुई। मैं एनसीसी के ब्राउन कड़क जूते पहनकर ठकठक करती सड़क पर निकल पड़ी। घरवालों ने कहा क्या एनसीसी इतनी ही ज़रूरी है। पर राष्ट्र प्रेम जिसके दिल में लबालब भरा हो, जिसकी बंदूक का निशाना जिले भर में सबसे अच्छा हो वो कैसे रुक जाए एनसीसी की परेड किए बगैर। उस सफ़ेद  अँधेरे से भरी सुबह में अपने आगे के रास्ते में प्रकाश ढूँढती मैं  ठक- ठक बढ़ती चली जा रही थी। पूरा रास्ता लगभग तय कर ही चुकी थी विद्यालय से थोड़ी ही दूर रही होऊँगी कि मेरे पीछे से कोई हरकत हुई। किसी ने जैसे मेरा पीछा करना शुरू कर दिया। सुनसान एकांत रात और सुनसान एकांत दिन में कोई विशेष अंतर नहीं होता। अपराधी के लिए बस किसी तीसरे की उपस्थिति अवांछित होती है। मैंने अपने पीछे किसी की उपस्थिति जानकार थोड़ा तेज चलना शुरू कर दिया, यह सोचकर निडर रही कि अगर सुबहसुबह अपने ही शहर की सड़कों पर डरते फिरे तो भला एनसीसी से जुड़कर, सेना में जाने का सपना पाल कर कौन सा तीर मार लेंगे। पीछे मुड़कर देखा, देखा तो एक पागल जो रास्ते में टूटी फूटी एक झोंपड़ी के आगे सोया या बैठा रहता था मेरे पीछे पीछे चला आ रहा था। मैं तेज़ चली तो वह भी तेज़ चलामैंने दौड़ना शुरू कर दिया उसने  भी दौड़ना शुरू कर दिया। मैं तेज़ दौड़ी  वह भी उतनी ही तेज दौड़ने लगा। मैंने ज़ोरज़ोर से गुलाम साबिर गुलाम साबिर, पुकारना शुरू कर दिया। हम लड़कियों का रखवाला-सा गुलाम साबिर हर समय अपने कान चौकन्ने रखता कि न जाने कब हम में से किसी को उसकी ज़रूरत आन पड़े। उस अँधेरी सुबह में मेरी  आवाज़ सुनते ही उसने मेरी आवाज़ की तरफ दौड़ना शुरू कर दिया, वो जल्दी ही मुझ तक पहुँच गया। मेरी  दौड़ थोड़ी धीमी पड़ी मेरे पीछे दौड़ने वाला दौड़ता हुआ सीधा चला गया। यानी वह तो मेरे पीछे दौड़ ही नहीं रहा था। एक लड़की यानी स्त्री को अकेलापन कितनी आशंकाओं से भर सकता है, उस अकेली सुबह ने बताया। परंतु गुलाम साबिर के होते कहाँ अकेला पन। वो इस तरह मेरे साथ चल रहा था जैसे मेरे पिता चलते उस क्षण। मेरे विद्यालय के समय का अभिभावक मेरे साथ था। उसके लिए मैं उन सैकड़ों लड़कियों में एक थी जो उस महाविद्यालय में पढ़ती थीं। पर वह हम सबके लिए एक ही था,सबके लिए बराबर गंभीर, बराबर जिम्मेदार, जिसकी आँखों में हम युवा लड़कियों का चमचमाता रुपहला सौन्दर्य कभी नहीं लहराया। तुम्हें नमन  गुलाम साबिर, तुम्हारी उस अद्भुत स्मृति को नमन जिसने मुझे पुरुषों के कुत्सित रूप से इतर उनके प्रति सकारात्मक बनने में सहयोग किया।

सम्पर्कः विद्या भवन, कचहरी रोड, बुलंदशहर, (उप्र) पिन– 203001, फोन- 9358488084,  ईमेल-nirdesh.nidhi@gmail.com

1 Comment:

vashini sharma said...

एक अनोखा अनुभव जो आजीवन सकारात्मक भाव देता रहेगा !

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