October 24, 2017

व्यंग्य:

 मेरी आदर्श जीवन- शैली 
- हरि जोशी
चिकित्सकों तथा अन्य अनुभवी मनीषियों का कथन है  देश में अनावश्यक कारणों से लोग मरते हैं। सडक़ों पर दुर्घटना से, विषैले तथा अस्वास्थ्यकर पदार्थ खाने से, प्रदूषित पानी पीने से, सिगरेट तम्बाकू के सेवन से, अथवा तेज़ ज़िन्दगी जीने से। भला इन अध्ययन शील लोगों, विशेषज्ञों की बात नहीं मानेंगे तो समाज का और अपना भला कैसे कर पायेंगे? इसीलिए इन दिनों खुद को स्वस्थ रखकर लम्बा जीवन जीने के लिए उन सबकी अनुशंसा के हिसाब से जीने लगा हूँ।
शुरू- शुरू में मैंने चिकित्सकों के मतानुसार जीवन-शैली बदली। सुबह, उठने से लेकर देर रात सोने तक उनके द्वारा बताया गया टाइम टेबल सामने रखा। चाय पीने से लेकर, दोपहर का भोजन, दवाई, सब कुछ नियत समय पर लेने लगा। एक मिनिट भी इधर उधर नहीं किया। डॉक्टर कहते रहे शक्कर सफ़ेद  ज़हर है। बिना खाए भी अन्य वस्तुओं से पर्याप्त मात्रा में मिलता रहता है। अत: इसे डायरेक्ट क्यों भकोसा जाए ज़हर खाकर मरने का तय ही कर लिया है तो धीमे धीमे खाओ; इसलिए शक्कर खाना छोड़ दिया। किसी ने लिखा, ‘चाय की पत्ती में अपमिश्रण है।चाय पीना बंद कर दया।
एक रिपोर्ट में कहा गया कि कड़ा परिश्रम दिल की बीमारी के लिए आमंत्रण है, इसीलिए मैंने लिखना -पढऩा छोडक़र सोना शुरू कर दिया। उस दिन पहली बार पत्नी ने मुझे मैगी खिलाई। दो तीन घंटे तक बेचैनी रही। संयोग से उसी दिन शाम को मैगी पर रिपोर्ट पढ़ ली कि कोई भी उसे न खाए, उसमें शरीर के लिए घातक तत्व मिले हुए हैं । मैंने पूरी ज़िम्मेदारी पत्नी पर डाली और ओढक़र सो गया।
निर्देश दे दिए कोई भी वस्तु बनाने के पहले उसके बारे में अच्छी तरह जानकारी ले लिया करो तब बनाया करो।देख लो मैगी पर यह रिपोर्ट स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताती है?’ उस दिन से घर में मैगी की छुट्टी कर दी।
सेहत सम्बन्धी पत्रिकाओं में पढ़ रखा था कि ब्राह्ममुहूर्त में घूमने जाने से स्वास्थ्य ठीक रहता है। एक दोबार गया भी। अँधेरे- अँधेरे गया तो सडक़ों पर स्वागत करने चाकूबाज़ और लुटेरे पाए। हारकर सैर बंद कर दी। लोगों को उजाला होने तक भी सब्र नहीं, उसके पहले ही स्कूटर और कार लेकर दौडऩे लगते हैं। उनके द्वारा शुद्ध वायु में घोला गया प्रदूषण भी चाकूबाज़ और लुटेरों से किसी तरह कम जानलेवा नहीं था
तय किया अब मैं स्वयं कार क्या स्कूटर भी नहीं चलाऊँगा, पर्यावरण को क्यों दूषित करूँ? अब पैदल पैदल ही चलूँगा। पर सरकारी आँकड़े देखे तो पाया पैदल चलने वाले ही सबसे बड़ी संख्या में दुर्घटना के शिकार हो रहे हैं? इस तरह मैं छुईमुई की तरह सबके छुए जाने से बचता रहा। विषैली हवा से मुक्त होने के लिए सड़क पर निकलना भी त्याग दिया।
चलो, अब उस शैली में रहूँगा जिसे शासन चाहता है। कहाँ से शुरू करूँ? नाश्ते से? आटा कौन-सा खाऊँ? गरीबी में गीला न हो जाए? रामदेव बाबा की चाय ठीक रहेगी? उनकी चाय की पत्ती में हड्डी का चूरा मिलाने की बात उछालकर एक विदुषी ने शोध को नई ऊँचाइयाँ दे दी थी। इस सबसे डरकर कई दिन तक, दो चार टमाटर, एक छोटा कच्चा खीरा खाकर जीवन यापन करता रहा। विशेषज्ञों ने तो यहाँ तक पता लगा लिया है कि उनका मोटापा बढ़ाने के लिए टमाटरों और लौकी में भी इंजेक्शन लगा दिए जाते हैं। ब्रेड में भी कालापन यानीवहाँ भी कार्बन। स्पष्ट है, कैंसर को आमन्त्रण देने वाले बहुमूल्य तत्व उसमें भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। तब एक विशेषज्ञ नेफ़रमाया- स्वस्थ बने रहने के लिए व्यक्ति को आर्गेनिक फल और सब्जियाँ खानी चाहिए। आर्गेनिक फल लेने गया तो दो संतरे, सौ रुपये में मिले। अरहर की या मूँग की दाल खाने की तो हिम्मत ही नहीं रही? यदि जिंदा रहने के लिए इतना महँगा खाद्य पदार्थ मिलेगा ,तब तो वैसे ही मर जायेंगे? हारकर बिसलरी या रेलनीर का महँगा पानी पीता रहा।
अब मैंने तय कर लिया है कि बिस्तर में पड़े-पड़े सिर्फ पानी ही पीऊँगा। सब में तो मिलावट है? पानी पी- पी कर कोसते रहना क्या बुरा है? मुझे तो यही सबसे सुरक्षित जीवन शैली लगी। अब जीवन के शेष वर्ष शांति से गुज़र जाएँ, इसलिए इन दिनों बिस्तर से उठकर सुबह सुबह मंजन करता हूँ, और पानी पीने के बाद पुन: बिस्तर में सो जाता हूँ। कर्मठ जीवन जीने का शायद श्रेष्ठ तरीका यही है। कोई और तरीका हो तो मार्गदर्शन करें ?
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