February 19, 2017

संस्मरण

एक साहित्यकार
एक शख़्स
हिमांशु जोशी
- सुदर्शन रत्नाकर
  अति सँरी गली से निकलते हुए जिसके शरीर का कोई अंग दीवार से न टकराए, दलगत राजनीति के कीचड़ के छींटें  जिसके शुभ्र वस्त्रों पर न पड़ें, जो प्रतिस्पर्धा की भागदौड़ का हिस्सा न बने फिर भी चर्चित हो। जिसके चेहरे पर सौम्यता, स्मित की पतली रेखा सदैव विद्यमान  रहती हो, वाणी में गम्भीरता नपे -तुले शब्द, जो कुछ भीतर है वही बाहर है, कहीं कृत्रिमता नहीं, कहीं अहं नहीं, सिर्फ़ सादगी। शिष्टाचार की प्रतिमूति, जो अपनी जन्मभूमि से दूर महानगर में रहकर भी अपनी मिट्टी को नहीं भूलता, ऊँचे शिखरों की ठंडी हवाओं के झोंके अब भी उसकी साँसों में बसते हैं, जो अपनी संस्कृति और अपनी परम्पराओं में बँधा है। संतुलित जीवन जीने वाला, संवेदनशील, आकर्षक व्यक्तित्व, जो भीड़ में भी अलग दिखाई देता है उस वरिष्ठ, अग्रणी, सशक्त रचनाकार, पत्रकार, विचारक का नाम है हिमांशु जोशी जिसके जीवन के गुण सहजता, सरलता, स्वाभाविकता, वैचारिक गहनता उनके साहित्य में भी प्रतिफलित हैं। इन विशेषताओं ने मेरे अंतर्तम को गहनता से प्रभावित किया है।
 हिमांशु जोशी जी का चर्चित उपन्यास ' तुम्हारे लिए ' साप्ताहिक हिन्दुस्तान पत्रिका में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ था ,जिसे पढ़ कर मेरे भीतर का लेखक जागा था ।मुझे लगा जैसे अप्रत्यक्ष रूप में मुझे लिखने की प्रेरणा दे दी हो। अठ्ठारह-बीस वर्ष की आयु में मैनें लगभग पुराने सभी लेखकों को पढ़ लिया था । प्रेमचंद और जैनेन्द्र कुमार मेरे मन पंसंद लेखक रहे । नए रचनाकारों की रचनाएँ ढ़ूँढ- ढ़ूँढकर पढ़ती;  लेकिन जो ठंडी  बयार के झोंके की तरह मेरे अंतर्मन को छूती रहीं वह थीं हिमांशु जोशी की रचनाएँ। उनकी सशक्त लेखनी का प्रभाव मुझ पर आज भी है।
हिमांशु जी से मिलने की लालसा थी;  पर यह सुअवसर मुझे अस्सी के दशक में मिला। हरियाणा साहित्य अकादमी से प्रकाशित कथायात्रा के विमोचन समारोह में। हिमांशु जोशी विशिष्ट अतिथि के रूप में विद्यमान थे। मेरी कहानी कथायात्रा में सम्मिलित थी, मैं भी वहाँ उपस्थित थी। समारोह के समापन के उपरांत मैं उनसे मिली। उन्हें अपना परिचय -दिया। मेरी कहानियाँ  पत्रिकाओं में छपती थीं। पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकीं थीं। मेरे नाम से वह थोड़ा-थोड़ा परिचित थे। मुझे प्रसन्नता हुई कि जिन्हें पढ़कर मैंने लिखना आरम्भ किया था, वे मुझे नाम से जानते हैं।
यात्रा की वापसी पर उनसे लम्बे समय तक बातचीत करने का सुअवसर मिला। उनके लेखन ने तो मुझे प्रेरणा दी थी, उनका जीवन के प्रति दृष्टिकोण, व्यावहारिक ज्ञान, स्पष्टवादिता, विशेष तौर पर महिलावर्ग के प्रति सम्मान ने प्रभावित किया। वह रिश्तों को निभाना भली -भाँति जानते हैं। उन तीन घंटों की बातचीत में पता चला कि बदलते पर्यावरण, रहन सहन के प्रति वे कितने चिंतित हैं और कितने सचेत भी। उनका मानना है कि भौतिकवाद के कारण हम जाने- अनजाने पर्यावरण को दूषित करते हैं। छोटी -छोटी बातों का ध्यान रखकर खान पान में शुद्धता ला सकते हैं,वातावरण स्वच्छ रख सकते हैं। मशीनीकरण के दुष्परिणामों को दूर कर सकते हैं जैसे अशुद्ध हवा को हटाने के लिए शुद्ध वायु का प्रवेश आवश्यक होता है। हम अपने उत्तरदायित्वों को समझें तो कुछ भी कठिन नहीं। बूँद- बूँद से ही घट भरता है।
 उनका जन्म अल्मोड़ा जि़ले के जोसयूड़ा गाँव में हुआ। बचपन खेतीखान में बीता और शिक्षा नैनीताल के मनोरम वातावरण में। यह शायद उसी का प्रभाव है कि उनका शरीर तो महानगर में है ; लेकिन आत्मा अभी भी वहीं है,  जो पहाड़ों की शीतल, शुद्ध हवाके लिए ललचाती है।
हिमांशु जी कठिनाइयों से कभी नहीं घबराते। जीवन की कई चुनौतियों को स्वीकारा है, पर निराश नहीं हुए। उनका मूलमंत्र है जो वह स्वयं के जीवन में भी अपनाते हैं और सम्पर्क में आने वाले को भी कहते हैं। 'जो हो गया, वह भी अच्छा था, जो हो रहा है, वह भी अच्छा है, जो होगा वह भी अच्छ होगा। जो मिल गया वह ठीक, जो नहीं मिला वह भी ठीक। जो अच्छा नहीं हुआ वह भी ठीक। इसी में कोई भलाई छिपी होगी।उनकी ये बातें शक्ति देती हैं। जो इनको जीवन में उतार ले वह कभी दुखी नहीं हो सकता। यही कारण है कि उनके जीवन में भागदौड़ नहीं, स्थिरता है। आत्मतुष्टि झलकती है।
  उस यात्रा में कई विषयों पर उनसे बातचीत हुई और मैं बहुत स्मृतियाँ लेकर अपने घर लौटी थी। उसके बाद कई बार हिमांशु जी से भेंट  हुई। फोन पर भी बातचीत होती रही। मैं उन दिनों उपन्यास 'क्या वृंदा लौट पाई!लिख रही थी, जो कई कारणों से आगे नहीं बढ़ पा रहा था। मेरे पति (स्व.) मोहन लाल रत्नाकर अस्वस्थ चल रहे थे, मेरा मन उद्विग्न रहता था कुछ लिख ही नहीं पाती थी जबकि वे चाहते थे कि मैं उपन्यास पूरा कर लूँ ; ताकि वे पढ़ सकें। उस समय हिमांशु जी मुझे प्रोत्साहित करते रहे , 'आधा पृष्ठ भी प्रतिदिन लिखोगी तो उपन्यास आगे बढ़ता जाएगा। रुकना नहीं, रुका पानी गंदला जाता है। विचारों पर भी जंग लग जाता है। लम चलती रहनी चाहिए।
हिमांशु जोशी जी की कहानियों, उपन्यासों में आम आदमी है उसका जिया हुआ यथार्थ है। वह आम आदमी जो हमारे बीच है, जो अपना सा लगता है। उके दुख दर्द, समस्याएँ उसके खुशी ग़म जैसे हमारे अपने है। हिमांशु जोशी जी का साहित्य के क्षेत्र में एक विशिष्ट स्थान है, जो अपनी विशिष्ट रचनाधर्मिता के कारण अलग दिखाई देते हैं लेकिन उससे पहले वह एक आम शख़्स हैं जो आम लोगों की भीड़ में अपने से लगते हैं ।

0 Comments:

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष