March 10, 2013

8 मार्च विश्व महिला दिवस



विशेषाधिकार नहीं,                समान अधिकार चाहिए
 -लोकेन्द्र सिंह
बैंक में भारी भीड़ थी। लोग घंटों से लाइन में लगे अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। तभी कॉलेज की एक लड़की आती है। उम्र 20-22 साल। तंग कपड़े पहने हुए और आँखों पर धूप का चश्मा चढ़ाए हुए थी। भीड़ देखकर परेशान थी। लेडीज फर्स्ट जुमले का फायदा उठाने के लिए लाइन  में खड़ी न होकर काउंटर पर आगे चली गई। तभी एक युवक ने उसे आवाज दी- ओ दोस्त लाइन में आ जाओ। हम भी बहुत देर से यहाँ खड़े हैं। क्या हो जाएगा? यदि मैं तुमसे पहले ड्राफ्ट बना लूँगी तो। अकेली ही तो हूँ, बस पाँच मिनट का ही तो अंतर आएगा। अब दूसरा दृश्य देखिए रेलवे स्टेशन टिकट के लिए लंबी कतार। ठीक बैंक वाली लड़की जैसी ही टिप-टॉप लड़की यहाँ भी आती है। आगे की ओर खड़े लोगों से अपना टिकट लेने का निवेदन करती है। इस पर एक युवक ने उससे कहा - अरे बहन, तुम खुद ही पहले टिकट ले लो। कहाँ लड़कों के साथ लाइन में फँसोगी। लकड़ी मुस्काती हुई आगे जाती है और टिकट ले लेती है। एक और दृश्य देखिए। मल्टीप्लेक्स सिनेमा का टिकट काउंटर। टिकट लेने के लिए लंबी लाइन लगी है। यहाँ भी महिलाओं की अलग से लाइन नहीं है। वह दो पल के लिए खड़ी होकर सोच ही रही थी कि टिकट ले या नहीं। इसके बाद वह लाइन में लगने लगी। लाइन में खड़े एक-दो लड़कों ने कहा- अरे आप कहाँ लाइन में लग रही हो। आप तो लड़की हो, आगे चली जाओ। वह पहले टिकट मिल जाएगा। यहाँ लड़की का जवाब गौर करने लायक था। उसने कहा- मुझे जरूरत नहीं। लड़की होने के कोई विशेषाधिकार नहीं चाहिए। जितने विशेषाधिकार देने थे, ऊपर वाले  ने दे दिए हैं। धरती पर तो बस सम्मान और समान अधिकार चाहिए।
    तीनों लड़कियों में आखिरी वाली लड़की ने पते की बात कही। विशेषाधिकार तो कमजोर होने की निशानी है। स्त्रियाँ सदैव से यह सिद्ध करती आई हैं कि कम से कम वे पुरुषों के मुकाबले किसी काम में कमजोर तो नहीं ही है। बल्कि की आगे ही हैं। व्यक्तिगत गुणों के मुकाबले भी पुरुष उनके सामने कहीं नहीं टिकता। अब देखें तो नारी आंदोलन के नाम पर हो उल्टा रहा है।  स्त्री के लिए विशेषाधिकार की माँग की जा रही है। जिसकी उसे कतई जरूरत नहीं है। उसके जीवन में कमी है तो समान अधिकार की। सम्मान की। ये उसे मिल जाए तो फिर किसी विशेषाधिकार की उसे जरूरत नहीं रह जाती। बलात्कार के खिलाफ दिल्ली में अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ। कानून में भी फेरबदल किया गया। लेकिन, क्या इससे बलात्कार की घटनाओं में कमी आई। जवाब है नहीं। लड़कियों को उसी रफ्तार से रौंदा जा रहा है। महानगर से लेकर कस्बे तक एक जैसे हालात हैं। सवाल उठता है कि तो कैसे बदलाव आएगा? क्या कानूनों को कड़ा नहीं किया जाना चाहिए? जरूर आएगा बदलाव। कानून भी कड़े होने चाहिए सभी तरह के अपराधियों के लिए। यह अलग बात है कि बदलते दौर में कड़े कानून स्त्रियों के सहायक तो हो सकते हैं लेकिन उसके प्रति समाज की सोच नहीं बदल सकते। स्त्री को देखने, सोचने और समझने का नजरिया बदलना होगा। इसकी शुरुआत किसी कानून के बनने से नहीं हो सकती। मन बनाना होगा। समाज यानी स्त्री-पुरुष दोनों को खुद से करनी होगी शुरुआत। स्त्री को कदम-कदम पर क्षणिक लाभ लेने के लिए खुद को कमजोर साबित करने से बचना होगा। उसे लेडीज फर्स्ट के जुमले को छोडऩा होगा। मैं नारी हूँ इसलिए मेरी मदद कीजिए, यह भी नहीं चलने देना होगा। पुरुष को भी यह खयाल दिल से निकालना होगा कि नारी को उसकी जरूरत है। देखने में आता है कि कोई लड़का गाड़ी धकेलकर ले जा रहा है तो कोई उससे नहीं पूछता कि क्या दिक्कत है? मैं क्या मदद कर सकता हूँ? लेकिन, स्थिति इसके उलट हो यानी जब कोई लड़की गाड़ी धकेलकर ले जा रही हो तो राह चलते सौ लोग रुककर उससे पूछते हैं, -क्या हुआ? कोई मदद तो नहीं चाहिए ? पुरुषों को हर काम में लड़कियों की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाने की मानसिकता से भी पीछा छुड़ाना होगा। इसकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी। अपनी बहन-बेटी को स्कूल-कॉलेज छोडऩे जाने की बजाय उसे स्वयं जाने दिया जाए। घर में बेटे के समान ही बेटी को भी पढ़ाई का अवसर उपलब्ध कराना चाहिए। उसे सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ाना चाहिए कि ब्याह करने में दिक्कत न आए। उसे अच्छा नौकरीपेशा वर मिल सके। जिस तरह लड़के को अफसर बनाने के लिए पढ़ाई पर पैसा खर्च किया जाता है वैसी ही बिटिया को भी अफसर बनाने का सपना देखना चाहिए। घर की संपत्ति में भी पुत्र के बराबर पुत्री को हक देना चाहिए। इस मामले में अभी समाज में बहुत रूढिय़ाँ है। घर की सबसे लाड़ली सदस्य से पिता, माँ और भाई भी उस समय खफा हो जाते हैं, जब वह शादी के बाद पैतृक संपत्ति में से अपना हिस्सा माँग ले। इस वक्त घरवालों का एक ही कहना होता है कि दहेज तो दे दिया, अब क्या भाइयों का हिस्सा भी चाहिए। खून के रिश्ते बिगडऩे से बचाने के लिए घर की बेटी छोटी-मोटी नौकरी करके गुजारा कर लेती है ; लेकिन किसी भी आपात् स्थिति में वह पिता की संपत्ति में से हिस्सा नहीं माँगती। यहाँ समानता लाने के लिए काफी प्रयास करने होंगे। असमानता और विभेद की लकीर घर में बेटा और बेटी को दी जाने वाली अलग-अलग नैतिक शिक्षा से भी बनती है। बेटे के लिए भरपूर आजादी। बेटी को ये नहीं करना चाहिए, वो नहीं करना चाहिए, तमाम बंदिशें। जबकि नैतिकता और मर्यादा का पाठ लड़की के साथ-साथ लड़कों को भी पढ़ाया जाए तो ठीक बनेगा आने वाला समाज।
    दिक्कत कहाँ है? क्यों तमाम प्रयास के बावजूद हम वहीं के वहीं खड़े हैं? इसके लिए हम सबके साथ-साथ बहुत हद तक नारी को आधुनिक बनाने के नाम पर चल रहे तमाम नारी आंदोलन भी जिम्मेदार हैं। मशहूर नारीवादी चिंतक जर्मेन ग्रीयर का कथन याद आता है कि  'नारीवादी आंदोलनों ने भारतीय नारी को बस तीन चीजें दी हैं- लिपिस्टिक, हाईहील सैंडल और ब्रा।  हम सबकी नजर में भी आधुनिक स्त्री की छवि लाली-पाउडर पोते, स्टाइलिश बाल कटवाए और जींस-टीशर्ट पहनने वाली लड़की की है। इतना ही नहीं नारीवादी आंदोलनों से जुड़े लोग नारी की आजादी के नाम पर सिर्फ यौनिक आजादी की ही प्रमुखता से चर्चा करते हैं। जिसका खामियाजा स्त्री को ही उठाना पड़ रहा है। यौनिक आजादी की आड़ में बाजार ने उसे अपना गुलाम बना लिया है। बाजार ने आधुनिक नारी का समूचा व्यक्तित्व उसके शरीर पर केन्द्रित कर दिया है। नारी देह दिखाकर साबुन से लेकर सीमेंट तक बेचा जा रहा है। बाजार अपने मतलब के लिए नारी देह से सारे लिबास नोंच लेना चाहता है।
    बाजार और नारीवादी आंदोलन के नाम पर आए भटकाव से तो स्वत: नारी को ही बचना होगा। उसे तय करना चाहिए कि उसकी पहचान कैसे हो? उसे जरूरत नहीं पुरुषों की नजरों में सुंदर दिखने की। उसे ही तय करना होगा कि बाजार की ओर से सुझाए कपड़े उसे पहनने हैं या फिर देह और देश-काल के अनुरूप। उसे जरूरत नहीं किसी का सामान बेचने के लिए अपना शरीर बेचने की। उसे घर से लेकर बाजार तक स्वयं को मजबूत साबित करना होगा। कहीं भी अगर पुरुष उसे कमजोर समझ कर आगे जाने का अवसर दे या दया भाव दिखाए तो स्त्री को ताकत के साथ उसका प्रतिरोध करना चाहिए। बराबर ताकत वाले का सब सम्मान करते हैं।

4 Comments:

कौशलेन्द्र said...

हूम्म्म्म्म... सच है, विशेषाधिकार की बैसाखियाँ समूह या व्यक्तिविशेष को दुर्बल बनाती हैं।

कौशलेन्द्र said...

शरीर .....के कुछ हिस्से ......और उनका प्रदर्शन। सब कुछ यहीं केन्द्रित है। पुरुष इसके समर्थन में है बाजार के लिये ...स्त्री इसके समर्थन में है दैहिक स्वतंत्रता के लिये। वह पुरुष की तरह स्वतंत्रता चाहती है ...कुछ भी करने की। नारीवादियों की ओर से प्रश्न है कि निगाह ख़राब तेरी और बुर्का पहनूँ मैं? नहीं पहनूँगी ...बुर्का तो बुर्का ....कुछ भी नहीं पहनूँगी। अंग प्रदर्शन का अधिकार हमें भी मिलना चाहिये। हमें सावित्री नहीं मेनका बनना है ...यही है नारी स्वतंत्रता।
अधिकारों की स्वतंत्रता को समझे बिना अधिकार और स्वतंत्रता की बात की जा रही है। मैंने पूछा कुछ महिलाओं से ....युवती,प्रौढ़ा और वृद्धा से भी; पूछा कि क्या उन्हें अपने घर की बच्चियों/किशोरियों/बहुओं को कम कपड़ों में देखने में कोई ऐतराज़ है? सब का उत्तर एक ही था "बिल्कुल ऐतराज़ है"। मैंने तर्क दिया कि आदिवासी स्त्रियाँ तो बहुत कम कपड़े पहनती हैं। उत्तर मिला- " किंतु वे भी जब शहर आती हैं तो कपड़े पहनकर ही आती हैं"।
तब ये कौन स्त्रियाँ हैं जो अंगप्रदर्शन को अपनी स्वतंत्रता की राह में अवरोध मानती हैं? मैं समझ नहीं पाता हूँ कि नारी स्वतंत्रता को कम कपड़ों के पैमाने से क्यों देखा जा रहा है? क्यों इस बात पर बल दिया जा रहा है कि कम कपड़े पहनने से ही नारी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति हो सकेगी?
देह के केन्द्र से बाहर आये बिना सारी बहस निरर्थक है। स्त्रियों को बाजार और विज्ञापन की दुनिया से स्वयं को पहले मुक्त करना होगा। इसके पश्चात ही उसका पथ प्रशस्त हो सकेगा।
इस विचारोत्तेजक लेख के लिये लोकेन्द्र जी को साधुवाद!

अमित वर्मा said...

आज पता नहीं क्यों मन में एक अजीब सा उद्वेग उठ रहा है ……….पैरों में कटे पर वाली चिड़िया सा दर्द, गले में एक जानलेवा चीख, मन में एक अव्यक्त सी पीड़ा दम तोड़ती जान पड़ रही है। बोलना चाहता हूँ पर क्या बोलूं ………मस्तिष्क में उपज रहे शब्द इस अतिसुधारवादी समाज की दलीलों से सामंजस्य बैठने में खुद को असमर्थ पा रहे है। समझ नहीं पा रहा हूँ कि जो कुछ मैं कहना चाहता हूँ वो सही है …..या जो कुछ ये हमारा सभ्य समाज कहता और करता है वो। हमारे देश को आज क्या हो गया है …..? हम सिर्फ दोषारोपण की विचारधारा को अपनाते हुए अपने आप को समाज की श्रेष्ठता सूची में सम्मिलित कर अपने कर्तव्य के निर्वाह की इतिश्री कर ले रहे है। क्या यही है एक अतिसुधारवादी समाज की बुनियाद ? वाह रे वीर भोग्या बसुंधरा…………………वाह….!!!

कभी बागपत में चंद अतिसुधारवादी समाज के ठेकेदारों ने ४० वर्ष से कम की महिलाओं एवं लड़कियों के बाज़ार जाने और मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी का फ़रमान ज़ारी कर दिया जाता है,तो कभी दिल्ली का रेप कांड तो कभी गुवाहाटी की एक ऐसी घटना की तस्वीरें सामने आती है, जो हमारी संवेदनशीलता की किसी भी मजबूत से मजबूत परत को उधेड़कर रख देने में सक्षम है। गोहाटी में जीएस रोड पर लगभग २० लड़के मिलकर एक बेबस लड़की के साथ बदसलूकी की, उसके कपड़े फाड़ते रहे और भीड़ तमाशबीन बनी खड़ी रही, इसी फेरिहस्थ में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दरबार से एक महिला फरियादी को घसीटकर बाहर निकाल दिया गया। मुख्यमंत्री की सुरक्षा में तैनात महिला क़ॉन्सटेबल ने जबरन घसीटकर उस औऱत बाहर कर दिया। इन घटनाओं के अलावा न जाने कितनी और घटनाएं रोज होती है जिनसे हम रूबरू होकर भी अनदेखा कर देते है और बैठ जाते है दूसरों को कोसने। जहाँ तक मैं अपने मस्तिष्क की उपज की उल्टी करूँ तो मैं आज तक ये समझ नहीं पाया कि इस विकृत मानसिकता का मूल स्रोत है तो आखिर है क्या ? क्या वे जो स्वयं भुक्तभोगी है ? क्या वो जो कथित तौर पर समाज सुधारक है ? या वो जो इस देश कि कानून व्यवस्था एवं देश कि शासन सत्ता की बागडोर को थमे बैठे है ? या वो वर्ग जो इन मुद्दों को नगद करने का कोई मौका नहीं गवाता ? [अचानक सामाजिक मूल्यों की दुहाई देकर अपनी छाती पीट रहे समाज का अचानक से आये इस परिवर्तन से वाकई मस्तिष्क का चकराना स्वभाविक है. वही मिडिया जो सनी लियोन, पूनम पाण्डेय इत्यादि को भारत की बहुत बड़ी विरासत दर्शाता है और उन्ही की तरह ही एक महिलाओ के खुलेपन के पक्ष में महिला आयोग (जी हा आप सही समझे, ये वही संसथान है जो रोज़ हजारो महिलाओ पर हो रहे अत्याचार पर कुछ नहीं करता मगर मिका अगर राखी सावंत से चुम्बन कांड कर दे तो गिरिजा व्यास खुद संज्ञान लेने पहुच जाती है) से लेकर दुसरे आयोगों के साथ इसकी पैरवी करता रहता है. दोस्तों भारतीय मीडिया पहले तो पूरा दिन आपको जिस्म-2 के ट्रेलर दिखायेगा, पूनम पांडे जितने कम कपडे पहनेगी उतनी ही तारीफ करेगा और वही घटना जब परदे की बजाये सड़क पर हो जाये तो आपके उपर सभ्यता (जो उसने कभी नहीं सिखाई) का लबादा जबरदस्ती ड़ाल देगा. मैं इन अमानवीय कृत्य की घोर निंदा करता हूँ ! मगर सोचिये जब एक बालक (महात्मा गाँधी) राजा हरिश्चंदर का नाटक देखकर सारी जिन्दगी सत्य और अहिंसा का पुजारी बन सकता है तो पूरे दिन चीरहरण देखने वाला देश का युवा भला किस दिशा में जायेगा ? ]


जहाँ तक मैं अपने मस्तिष्क की सोंच को आगे बढ़ाऊ तो इसकी शुरुआत हमारी आपकी मानसिकता ही इसकी मूल वजह है, हम यहाँ यथार्थ को स्वीकार न करके बस अपने तरीके से दूसरों को समझाने में लगे रहते है।

अमित वर्मा said...


कहते हैं कि शिक्षित वर्ग समाज कि सबसे सशक्त कड़ी है और यह एक सभ्य समाज की रचना करता है, पर क्या आज जो कुछ इस सभ्य कहे जाने वाले समाज में घटित हो रहा है……क्या ये शिक्षित वर्ग जनित है …क्या यही शिक्षा प्राप्त कर रहा है हमारा समाज……..? मैं कोई दार्शनिक नहीं हूँ पर फिर भी ये कहना चाहूँगा कि इस पुरुष प्रधान देश में क्यों कोई ऐसा नियम पुरुषों के लिए बनाया जाता है जिससे इस पर अंकुश लगाया जा सके। कभी कोई नियम बना भी तो वह पूरी तरह लागू नहीं हो सका……! एक टेलीविजन एड कि ये पक्तियां मुझे इसका एक मात्र हल लगती है कि -“डर के आगे जीत है” और ये डर ही हमारे समाज से निकल सा गया है, जब तक ये डर उस विकृति मानसिकता में घर नहीं करेगा कोई सुधार नहीं होगा। हमें कुछ ऐसे नियमों को कड़ाई से लागू करना होगा जो इस समाज में उन लोगों के लिए खौफ़ का पर्याय बन जाए जो अपनी विकृति मानसिकता से इस तरह के कृत्यों को सिर्फ अपने मजे के लिए अंजाम दे रहे है। पर ये सब लागू कौन करेगा ? क्योकि यहाँ किसी को कोई सजा होती ही नहीं, हमारे देश का मानवाधिकार आयोग ही इस समस्या को खत्म नहीं होने देना चाहता है पहले तो यह उस घटना पर आँसू बहाएगा….फिर उस मुजरिम के बचाव में खड़ा हो जायेगा जिसके द्वारा कृत्य किया गया होता है……आखिर ये है क्या ? शायद यह तब तक मुम्किन न होगा जब तक भारतीय सविधान में संशोधन न हो। कहते है परिवर्तन प्रकति का नियम है जरुरत के मुताबिक परिवर्तन आवश्यक है ….पर यहाँ क्यों नहीं !!!

लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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