September 23, 2010

इस अंक में

वर्ष 1, अंक 1, सितंबर 2010

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किताबें ऐसी शिक्षक हैं जो बिना कष्ट दिए, बिना आलोचना किए और बिना परीक्षा लिए हमें शिक्षा देती हैं।
- अज्ञात
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बुनियादी शिक्षा

शिक्षा मनुष्य के जीवन को सही दिशा देने का ऐसा माध्यम है जो उसे एक परिपक्व, समझदार और दुनिया को सही तरीके से देखने का नजरिया देता है। ऐसा नजरिया वह तभी प्राप्त कर सकता है जब प्राथमिक स्तर पर ही उसकी शिक्षा पर ध्यान दिया जाए। यह बहुत अफसोस की बात है कि हमारे देश में आजतक किसी भी शिक्षा मंत्री ने प्राथमिक शिक्षा के बुनियादी ढांचे के संदर्भ में समग्र रूप से कोई ठोस नीतिगत बात नहीं रखी है। सवाल गंभीर है कि मुफ्त शिक्षा देने की घोषणा कर देने से ही क्या सर्वशिक्षा अभियान सफल हो जाएगा? जब तक आप बच्चों को सामान्य बुनियादी सुविधाएं जैसे स्कूल भवन, बैठने के लिए कुर्सी- टेबल, पढऩे के लिए कॉपी- किताबें, स्कूल यूनिफार्म और स्कूल आने- जाने के लिए पर्याप्त साधन मुहैया नहीं कराएंगे तब तक आप कैसे सोच सकते हैं कि उन्हें अच्छी शिक्षा मिल रही है। दोपहर का भोजन परोस कर आप स्कूल आने वाले बच्चो की संख्या में इज़ाफ़ा तो कर सकते हैं पर क्या उन्हें आप इतने काबिल शिक्षक भी दे रहे हैं जो उन्हें एक अच्छा नागरिक बनने में सहायता कर सके। हम सभी इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्राथमिक स्तर पर पढऩे वाला बच्चा अपने शिक्षक को आदर्श मानता है। वह अपने माता- पिता की आज्ञा का उल्लंघन एक बार भले कर दे पर अपने शिक्षक की बात वह कभी नहीं टालता।

सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे महान आदर्शवादी शिक्षक के नाम पर एक दिवस मना कर हम चाहते हैं कि प्रत्येक शिक्षक उन जैसा आदर्शवादी बने और अपने प्रत्येक विद्यार्थी के सामने मिसाल पेश करे। पर कभी हमने बच्चों के जीवन की नींव तैयार करने वाले इन शिक्षकों के जीवन के दूसरे पहलू की ओर भी झांकने का प्रयास किया है- जिस वातारवण में वे पढ़ाते हैं, जितना वेतन उन्हें मिलता है, पढ़ाने के लिए जितनी सुविधा उन्हें दी जाती है क्या वह पर्याप्त है? ऐसे में एक आदर्श प्रशिक्षित शिक्षक की उम्मीद हम कैसे कर सकते हंै। यही नहीं अधिकांश राज्यों में संविदा नियुक्ति पर शिक्षकों की बहाली की जाती हैं और तो और जब चाहे तब सरकारी कार्यों में उन्हें इस तरह लगा दिया जाता है मानों वे दैनिक मजदूर हों, चाहे चुनाव का वक्त हो या फिर जनगणना का। इन परिस्थितियों के बावजूद हम चाहते हैं कि वे बच्चों के सामने आदर्श प्रस्तुत करें। यह कहां का इंसाफ है कि एक ओर तो हम उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक के बाद एक सुविधाएं बढ़ाते जा रहें हैं वहीं प्राथमिक स्तर पर सुविधाएं देने के नाम पर उनके साथ दोयम दर्जे के कर्मचारी की तरह पेश आते हैं। एक आदर्श शिक्षक बनने के लिए पहले उन्हें एक आदर्श माहौल तो दीजिए।
कितने अफसोस की बात है कि हमारे आज के नीति- निर्धारक यह भूल जाते हैं कि कोई भी विश्वविद्यालय बगैर प्राथमिक शिक्षा के अधूरी है, वे विश्वविद्यालयीन शिक्षा का मतलब सिर्फ उच्च शिक्षा से लगाते हैं जबकि सच्चाई बिल्कुल इसके विपरीत है। महामना मदनमोहन मालवीय ने शिक्षा के क्षेत्र में जो उदाहरण बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय बनाकर रखा वह किसी भी शिक्षण संस्था के लिए एक आदर्श है। ऐसे माहौल में जबकि उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बहुत अधिक प्रयास किए जा रहे हैं हमें यह गंभीरता से विचार करना होगा कि प्राथमिक शिक्षा को बेहतर बनाए बगैर उच्च शिक्षा के बेहतर होने की बात बेमानी होगी। शिक्षा की नींव प्राथमिक स्तर पर ही बनती है यदि नींव मजबूत होगी तभी हम उसके ऊपर मजबूत भवन बनाने की बात सोच सकते हैं। परंतु हो इसके बिल्कुल उल्टा रहा है, नींव की गहराई को देखे बिना भवन की ऊंचाईंयां नापी जा रहीं हैं, ऐसे में एक बेहतर शिक्षित राष्ट्र की कल्पना भला हम कैसे कर सकते हैं।
यद्यपि राजनीतिक दांव- पेंच के चलते शिक्षा न्यायाधिकरण विधेयक पारित नहीं हो सका। उच्च शिक्षा के लिए लाए जा रहे इस विधेयक के संदर्भ में यही कहा जा सकता है कि उच्च शिक्षा पर इतना अधिक जोर देने के पहले हमारे आकाओं को प्राथमिक शिक्षा के हालात में सुधार की बात पहले करनी चाहिए। यद्यपि बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा विधेयक 2009 (जिसके अंतर्गत छह से चौदह वर्ष की उम्र के सभी बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने की बात कही गई है) पारित हो चुका है। इस बिल के पारित होने पर शिक्षा के क्षेत्र में इसे एक ऐतिहासिक कदम करार दिया गया था, पर मात्र इतने भर से क्या राजनीतिक जिम्मेदारी पूरी हो जाती है? कागजों में पारित इस विधेयक में सबसे बड़ी खामी तो यही है कि इस बिल के प्रावधानों को अपने- अपने राज्यों में लागू करने की पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकारों के जिम्मे सौंप दी गई है। जबकि यह मानी हुई बात है कि शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मसले पर लिए गए किसी भी निर्णय को पूरे देश में लागू करने की अहम जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की ही होनी चाहिए। परंतु उसने तो विधेयक पारित करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली।
अफसोस की बात है कि आजादी मिलने के बाद आज तक शिक्षा के नाम पर सरकार का पूरा ध्यान उच्च शिक्षा के प्रसार के ऊपर रहा है। इसके बावजूद जहां तक हमारी उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता का प्रश्न है तो इनकी भी स्थिति दयनीय है। इसी माह में प्रकाशित विश्व की उच्च शिक्षा संस्थाओं की गुणवत्ता की सूची में प्रथम दो सौ संस्थाओं में भारत की सिर्फ एक संस्था आईआईटी मुम्बई को 182वां स्थान मिला है। जबकि चीन की चार शिक्षा संस्थाएं प्रथम दो सौ संस्थाओं में स्थान पाती है। यह एक और प्रमाण है सरकार द्वारा शिक्षा की उपेक्षा का।
किसी भी राष्ट्र के समग्र विकास के लिए मजबूत आधारभूत ढांचे की आवश्यकता होती है जिसका सबसे महत्वपूर्ण अंग शिक्षित जनता होती है। सीधी बात ये है कि आज राष्ट्र की सबसे बड़ी जरुरत है शिक्षा के प्रसार को सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना। शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता निश्चित होती है सभी संसाधनों से युक्त प्राथमिक शिक्षा विद्यालयों से। अतएव केंद्रीय सरकार को सबसे पहले 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए पूरे देश में सभी संसाधनों से युक्त विश्वविद्यालयों की स्थापना को अपनी प्राथमिकता बनाना है। आशा है प्रधानमंत्री इस ओर वांछित ध्यान देंगे।
-रत्ना वर्मा

बांस के फूल जो जीवन में सिर्फ एक बार खिलते हैं!


- कृष्ण कुमार मिश्र
गरीबों का टिम्बर कहा जाने वाला बांस जिसका हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान है। जो बढ़ती मानव आबादी व लगातार दोहन के कारण प्राकृतिक रूप से नष्ट होता जा रहा है। एक वक्त था कि प्रत्येक गांव में कई तरह के बांसों की झाडिय़ां होती थी। बांस के लगभग 1500 उपयोग लिखित रूप से दर्ज हैं। अब इनके सीमित व बुनियादी जरूरतों वाले कुछ मुख्य उपयोग बचे हुए हैं, जैसे ग्रामीण अपना घर बनाने में, कृषि यन्त्र बनाने के अलावा रोजमर्रा की जिन्दगी में न जाने कितने प्रकार से बांस को उपयोग में लाते रहे हैं। बांस के बने हैंडीक्राफ्ट की चीजों का व्यापार कुटीर उद्योग की शक्ल ले चुका था, पर अब धरती के लिये जहर जैसा प्रभाव डालने वाली प्लास्टिक के आ जाने से ये छोटे व पर्यावरण के लिये उत्तम उद्योग चौपट हो चुके हैं।
उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में झंकरा बांस की लाठियां तो इतनी लोकप्रिय रही कि आज भी गांव-जेवार में लगने वाले मेलों में आप तेल पिलाई हुई प्राकृतिक रंगों द्वारा विभिन्न तरह के रेखाचित्रों से सुसज्जित लाठियां बिकती हुई देख सकते हैं।
भारत में बांस की स्थिति
बांस के मामले में भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य के जंगल पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। भारत में बांस के वन 10 मिलियन हेक्टेयर भूमि को आच्छादित किये हुए हैं, जो हमारे देश के कुल वन क्षेत्रफल का 13 प्रतिशत है, इनमें से 28 प्रतिशत बांस के वन उत्तर-पूर्वी राज्यों में मौजूद हैं। बांस पूरे भारतवर्ष में हर जगह प्राकृतिक रूप से पाया जाता है, इसकी मुख्य वजह है, कि कम पानी व कम उपजाऊ भूमि में यह आसानी से उग आता है। बांस की पृथ्वी पर पाई जाने वाली कुल 1250 प्रजातियों में से भारत में 145 प्रजातियां पाई जाती हैं। लेकिन अब भारत में उत्तर-पूर्वी राज्यों को छोड़कर अन्य जगहों पर बांस की प्रजातियों का विलुप्तीकरण शुरू हो गया है, उत्तर प्रदेश में यह दर सबसे अधिक है! जबकि बांस कृषि क्षेत्र की बड़ी समस्याओं से निपटने में सक्षम हैं, जैसे जानवरों द्वारा अन्य फसलों को नष्ट किया जाना, अत्यधिक रोगों का लगना जो उत्पादन को कम क देता है, पानी की कमी आदि समस्याओं से बांस की खेती करके छुटकारा पाया जा सकता है। सूखी व परती भूमि पर बांस की खेती की जा सकती है, और बांस की विस्तारित जड़े मृदा अपरदन को भी रोकती हैं, इस प्रकार बांस भूमि सरंक्षण में भी सहायक है। बांस की शूट का उपयोग भोजन के रूप में, व तनें में इकठ्ठा पानी का अचार के रूप में भी उपयोग किया जाता है।
किसानों, पर्यावरण भूमि सरंक्षण में मुफीद
बांस की बिना कांटेदार, उन्नत प्रजातियां शोध संस्थानों में मौजूद हैं, जहां से किसान इन्हें प्राप्त कर सकते हैं। बांस दुनिया की सबसे लम्बी घास हैं, इसकी लम्बाई एक दिन में एक फीट तक बढ़ सकती है और बांस का एक तना 30 दिनों में अपनी पूरी लम्बाई प्राप्त कर लेता है। लेकिन बांस के पूर्ण परिपक्वन में 4 से 5 वर्ष लग जाते हैं। यह ग्रेमिनी कुल से है और इसी कुल में दूब घास व गन्ना, गेहूं जैसी प्रजातियां शामिल हैं, संयुक्त जोड़दार तना इसकी मुख्य पहचान है। किसानों के अतरिक्त सरकार भी ग्राम सभा व अन्य परती भूमियों पर विदेशी व हमारे पर्यावरण के लिये नुकसानदायक प्रजातियों यूकेलिप्टस, पोपलर आदि के बजाए बांस का उत्पादन करा सकती है, जिससे रेवन्यू में बढ़ोत्तरी के अतिरिक्त हमारे पर्यावरण को बहुत फायदा पहुंचेगा।
जीवन में एक बार ही खिलता हैं बांस
बांस में फूल आना अकाल का सूचक माना जाता रहा है, और बांस में पुष्पन अभी भी रहस्य बना हुआ है! क्योंकि बांस में फूल आने की कोई निश्चित समयावधि नहीं होती, पारम्परिक ज्ञान व वैज्ञानिक शोधों से जो तथ्य सामने आये हैं उनमें बांस की विभिन्न प्रजातियों में विभिन्न समयान्तराल में फूल आते हैं और यह समयावधि 40 से लेकर 90 वर्ष तक की हो सकती है।
बांस के बीज में टाइम मशीन
जब बांस फूल देना आरम्भ करता है, तो उसकी पूरी की पूरी समष्टि में एक साथ पुष्पन होता है, फिर चाहे उस बीज से उगाया गया बांस अमेरिका में हो या बांग्लादेश में। लगता है प्रकृति ने इन बीजों में टाइम मशीन लगा दी हो... एक साथ फूल खिलने की!
बांस का खिलना उसके नष्ट होने की निशानी है, तो दुर्भिक्षता की सूचक भी
बांस खिलने के बाद नष्ट होना शुरू हो जाता है और इन फूलों में बने बीज जो बहुत पौष्टिक होते हैं, चूहों के लिये सर्वोत्तम आहार है, नतीजतन चूहों की संख्या में अचानक वृद्धि होती है, बांस के पौष्टिक बीज उनकी प्रजनन क्षमता को बढ़ा देते हैं। जब ये बांस नष्ट हो जाते हैं तो यह चूहों की फौज गांवों की तरफ रूख करती है, नतीजा यह होता है कि किसान की फसलों से लेकर घरों में इकट्ठा अनाज ये चूहे चट करने लगते हैं। साथ ही इन चूहों द्वारा तमाम तरह की बीमारियां भी मानव घरों तक पहुंचती हैं। ऐसे हालात में इन इलाकों में अकाल व दुर्भक्षिता के दिन आ जाते हैं।
बांस मिजों आन्दोलन का कारण बना
सन् 1959-60 में ऐसे हालात मिजो जनपद में पैदा हुए थे। आज का मिजोरम तब आसाम प्रदेश का एक जनपद हुआ करता था। चूंकि मिजोरम बांस का सबसे अधिक उत्पादन वाला क्षेत्र था, इसके अतीत में बांस फूलने से अकाल पड़ जाने की कई घटनायें हुई, इसलिए सन 1958 में जब बांस फूलना शुरू हुआ तो पूर्वानुमान व दुर्भक्षिता से बचने के लिये मिजो लोगों ने असम सरकार से 15 लाख रूपयों की मांग की, लेकिन असम सरकार ने यह कहकर मना कर दिया कि भविष्यवाणी व अवैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर वे सहायता नहीं दे सकते और संकट में इस उपेक्षा से मिजो जनपद के लोगों ने 'मिजो नेशनल फेमाइन फ्रन्ट' की स्थापना कर जनपद वासियों के लिये सहायता का प्रबन्ध किया, फिर यही राजनैतिक संगठन के तौर पर नये नाम 'मिजो नेशनल फ्रन्ट' के नाम से जाना गया।
यहीं से मिजो में अवमानना व अलगाववाद की भावना भड़क उठी। जिसे बुझने में बीस बरस लग गये। 1 मार्च 1966 को एम.एन.एफ. ने भारत सरकार से सन्धि कर ली और 20 फरवरी 1987 को मिजो जनपद मिजोरम राज्य के रूप में इण्डियन यूनियन का 23वां प्रदेश घोषित हुआ।
2003-04 में खीरी जनपद में खिले बांस में फूल
उत्तर भारत में बांस की इतनी तादाद नहीं है कि बांस खिलने से अकाल की स्थिति आ जाये, किन्तु यहां भी बांस फूलने को अपशगुन माना जाता है। बारिश न होना, सूखा पड़ जानें जैसी भ्रान्तियां प्रचलित हैं। उत्तर प्रदेश के खीरी जनपद में अप्रैल 2003 में पुष्पन हुआ था और यह प्रक्रिया 2004 तक जारी रही। जिससे यहां के सारे बांसों के समूह नष्ट हो गये, जिनमें पुष्पन हुआ था। इसी के साथ बांस की तमाम देशी प्रजातियां नष्ट हो गयी। खीरी में राजा लोने सिंह मार्ग पर बबौना गांव के समीप स्थित 60-70 वर्ष पुराना बांस का झुरूमुट पुष्पित हुआ, वहीं पदमभूषण बिली अर्जन सिंह के फार्म टाइगर हैवेन में लगे नवीन बांस जिसकी लम्बाई चार-पांच सीट तक थी में फूल आ गये थे... ये है बीजों की टाइम मशीन...यह दोनों जगह के बांसों का जेनेटिक रिश्ता है। बांस में फूल आने की इतनी अधिक लम्बी अवधि के कारण, कहा जाता है कि आदमी अपने जीवन काल में एक ही बार बांस का फूलना देख पाता है।
पता: 77, कैनाल रोड, शिव कालोनी, लखीमपुर खीरी- 262701 (उ.प्र.) ईमेल- dudhwalive@live.com

कॉमनवेल्थ गेम्स पर कोहरे का कहर

कैसे खेलेंगे खिलाड़ी?
- डॉ. . पी. जोशी
अपनी खेल गतिविधियों के कारण खिलाड़ी सामान्य लोगों की तुलना में तेज श्वसन करते हैं एवं अधिक वायु का प्रवेश फेफड़ों में होता है। अधिक मात्रा में ली गई वायु यदि प्रदूषित है तो वह खिलाडिय़ों पर विपरीत प्रभाव डालकर खेल क्षमता को घटा देती है। अत: खेल के स्थानों पर वायु प्रदूषण न्यूनतम होना चाहिए। अंर्तराष्ट्रीय खेलों के आयोजन के समय अब इसके लिए प्रयास किए जाने लगे हैं।
दिल्ली में अक्टूबर 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन है परन्तु वहां पर पर्यावरण की स्थिति अनुकूल नहीं है। दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए किए जा रहे निर्माण कार्यों के समय ऐसे कोई उपाय नहीं अपनाए गए जो धूल के उडऩे को कम करते। बीजिंग ओलम्पिक के समय निर्माण कार्य के क्षेत्रों को ढककर कार्य किया जाता था ताकि धूल न फैले। दिल्ली में वृक्ष भी काफी काटे गए जिससे वायु प्रदूषण में वृद्धि हुई है।
वायु प्रदूषणकारी तत्वों में प्रमुख निलंबित धूल कण (एस.पी.एम.) एवं श्वसन-योग्य कणों (आर.एस.पी.एम.) की औसत मात्रा दिल्ली में वर्ष 2006-2008 में क्रमश: 326 एवं 140 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर थी जो वर्ष 2009 में बढ़कर 484 एवं 272 हो गई एवं वर्ष 2010 में 553 एवं 322 तक पहुंच गई। कुछ वर्षों पूर्व सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट ने दिल्ली के कई क्षेत्रों में ओजोन की औसत मात्रा 40.45 पीपीबी (पाट्र्स पर बिलियन) आंकी थी। घने यातायात के क्षेत्रों में यह मात्रा 100 से 120 तक थी।
अक्टूबर में शीतकाल भी प्रारंभ होगा एवं दिल्ली में कोहरे की समस्या भी होगी। कोहरा भी खिलाडिय़ों के लिए खतरनाक होता है। लॉस एंजिलिस में 1978 में राष्ट्रीय खेलों के समय लगभग एक दर्जन खिलाड़ी कोहरे से प्रभावित होकर बीमार हो गए थे।
अक्टूबर में शीतकाल भी प्रारंभ होगा एवं दिल्ली में कोहरे की समस्या भी होगी। कोहरा भी खिलाडिय़ों के लिए खतरनाक होता है। लॉस एंजिलिस में 1978 में राष्ट्रीय खेलों के समय लगभग एक दर्जन खिलाड़ी कोहरे से प्रभावित होकर बीमार हो गए थे। अमेरिका के के.के. स्कूल ऑफ मेडिसिन के वैज्ञानिकों के अनुसार अधिक वायु प्रदूषण से खिलाडिय़ों में दमा की संभावना बढ़ जाती है। एथलीट्स सामान्य की तुलना में 10-15 गुना ज्यादा हवा ग्रहण करते हैं एवं ओजोन इस पर विपरीत प्रभाव डालती है। 0.02 पीपीएम ओजोन खिलाडिय़ों, विशेषकर धावक व सायकल रेस प्रतिभागियों को एक घंटे में ही परेशान कर डालती है। दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु व नेशनल स्टेडियम मुख्य मार्गों के नजदीक है। अत: यहां प्रदूषण भी अधिक है। पर्यावरणविदों के अनुसार खेल के समय यहां धूल के महीन कणों की मात्रा चार गुना कम करनी होगी। कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली में भारी वायु प्रदूषण के कारण ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेट बोर्ड ने खिलाडिय़ों को दिल्ली में मैच खेलने से मना किया था।
दिल्ली स्थित विज्ञान व पर्यावरण केन्द्र पहले ही दिल्ली में प्रदूषण की भयावह स्थिति के कारण घटते स्वच्छ दिनों पर गहरी चिंता व्यक्त कर चुका है। केन्द्र द्वारा मई 2010 में जारी रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में स्वच्छ हवा के दिन लगातार घटते जा रहे हैं। वर्ष 2006 से 2008 तक दिल्ली में प्रदूषण का न्यूनतम स्तर 30 प्रतिशत दिनों में ही था। वर्ष 2009 में 40 प्रतिशत दिन स्वच्छ आंके गए एवं वर्ष 2010 में जनवरी से मई तक 8 प्रतिशत दिन ही निरापद रहे। बढ़ते वायु प्रदूषण का प्रभाव स्वास्थ्य पर भी हो रहा है। दिल्ली में प्रति पांच में से दो लोग श्वसन रोगों से प्रभावित हैं। अक्टूबर तक यदि वायु प्रदूषण नियंत्रित नहीं किया गया तो यह खिलाडिय़ों को प्रभावित करेगा।

जनसंचार माध्यम द्वारा प्रदूषित होती हिन्दी

-गिरीश पंकज
और अब छीनने आए हैं। वे हमसे हमारी भाषा।
यानी हमसे हमारा रूप। जिसे हमारी भाषा ने गढ़ा है।
और जो इस जंगल में। इतना विकृत हो चुका है।
-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
जनसंचार माध्यम की हिन्दी-दुनिया पर सर्वेश्वर जी की उपयुक्त कविता कितनी सटीक बैठती है। जनसंचार माध्यम एक बड़ा फलक है। इसमें प्रिंट एवं चाक्षुस, दोनों माध्यमों के विविध आयाम समाहित हो जाते हैं। इन दोनों माध्यमों में हिन्दी की जो दुर्गति हो रही है, वह किसी से छिपी नहीं है। हिन्दी के मामले में इन दिनों अद्भुत उदारीकरण दिखाया जा रहा है। हिन्दी के साथ अंग्रेजी के शब्दों की घुसपैठ करके वाक्य-संरचनाएं हो रही हैं।
भाषाओं का आदान-प्रदान होना ही चाहिए। किसी भी भाषा की समृद्धि के लिए यह जरूरी उपक्रम है, लेकिन जब यह घुसपैठ भाषिक औदार्य न हो कर हीनता के बोध से उपजे तो चिंता स्वाभाविक है। हिन्दी के साथ यही हो रहा है। हिन्दी के साथ घुसने वाले अंग्रेजी के शब्दों के कारण एक नई भाषा- वर्ण विकसित हो रहा है, जिसे लोग हिंगरेजी या हिंग्लिश कहने लगे हैं। अंग्रेजी का ऐसा प्रभाव हमारे मानस पर हुआ है, कि हम लोग बौरा गए हैं। लार्ड मैकाले बड़ा चालाक था उसने भारतीयों के जेहन में इस सत्य को बिठाने की पुरजोर कोशिश की यह कहकर कि अंग्रेजी आधुनिक ज्ञान की कुंजी है। यह पश्चिम की भाषाओं में सर्वोपरि है। उसने कहा कि अंग्रेजी भारत में वैसे ही पुनर्जागरण लाएगी, जैसे इंग्लैंड में ग्रीक अथवा लैटिन ले आई अथवा जैसे पश्चिमी यूरोपीय भाषाओं ने रूस को सभ्य बनाया। मैकाले ने जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शंस की मिनिट 1835 में साफ तौर पर यह कहा था, कि इस समय हमें अपनी सर्वोत्तम शक्ति का उपयोग कर एक ऐसे वर्ग की सृष्टि करनी है, जो हमारे और उन लाखों, जिन पर हम शासन करते हैं, के बीच दुभाषिए का काम कर सके। लोगों का एक वर्ग जो रक्त और रंग में भारतीय हो किंतु रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेजी हो। आज जो हालात हम देख रहे हैं, उस के हिसाब से कई बार लगता है, कि मैकाले जैसा चाहता था, वैसा तो हो चुका है।
पत्रकारिता के समकाल को देखता हूं तो गुप्त जी याद आते हैं। आपने कहा था- हम कौन थे, क्या हो गये, और क्या होंगे अभी...। इस पीड़ा से भला कौन सहमत न होगा, कि देश से अंग्रेज तो चले गए, लेकिन अंग्रेजी छोड़ गए। यह पूरे देश की पीड़ा है। भारत का स्वदेशीपन तो जैसे लापता हो गया है। अंग्रेजी तो एक उदाहरण भर है। इसे हमने इस कदर आत्मसात कर लिया है, कि मत पूछो। सोते- जागते, उठते- बैठते सिर्फ अंग्रेजी। यह हमारी जीवन- शैली में समा गई है। नतीजा सामने है। हिन्दी के अनेक तथाकथित राष्ट्रीय समाचार पत्र तक अंग्रेजी के व्यामोह में हैं। इन अखबारों के स्तंभों के नाम देखिए- हैलो दिल्ली, मैट्रो वार्ता, यूथ वुमन, सिटी हलचल, बैक कवर, एजुकेशन, पेज थ्री, मैनेजमेंड फंडा, कैरियर डायरेक्टरी, नॉलेज बैंक, एडमिशन एलर्ट, सिटी डायरी, क्राइम डायरी जैसे अनेक स्तंभों को देख कर हैरत होती है। लगता है कि
हिन्दी अचानक कितनी दरिद्र हो गई है कि उसके पास शब्दों का टोटा पड़ गया है इसलिए दूसरी भाषा से शब्द आयातित करने पड़ रहे हैं। दु:ख भी होता है।
मैं हिन्दी पत्रकारिता की दुनिया में तीन दशक से हूं इसलिए इसके उत्थान को देखा है, लेकिन अब पतन के दौर को देख कर पीड़ा होती है। पत्रकारिता नैतिक-दृष्टि से गिरी है तो भाषाई- दृष्टि से भी नीचे गिरती चली गई है। कुछ लोग हिन्दी में अंग्रेजी के शब्दों की घुसपैठ को प्रयोजनमूलकता का नाम भी देते हैं। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि प्रयोजन का प्रयोजन ही सिद्ध न हो सके। अंग्रेजी के ऐसे शब्द हिन्दी के पाठकों या दर्शकों के किस काम के जो आम पाठ समझ ही न सके। जैसे हेल्दी बेबी कैम्प, सिटी का क्राइम रेट बढ़ रहा, सीरियल अच्छा नहीं तो चैनल चैंज, सेंट्रल कमेटी ने बनाया प्लान, हेडमास्टर या फूड इंस्पेक्टर सस्पेंड, कॉलेज की सारी सीटें फुल, मिड डे मील पर एजिटेशन आदि ऐसे अनेक शीर्षक देखे जा सकते हैं, जो हिन्दी में भी होते तो अर्थ-ग्राह्यता में कोई दिक्कत नहीं थी। जगह भी ज्यादा नहीं घेरते। लेकिन पता नहीं कैसे धीरे- धीरे हिंग्लिश का भूत जेहन में सवार होता गया और हम लोग दोपहर के भोजन को मिड डे मील समझने में आसानी महसूस करने लगे। विरोध की जगह एजिटेशन आसान लगने लगा और हेल्दी बेबी कैंप सरल और स्वस्थ शिशु शिविर कठिन लगने लगा। हां, मैं हिस्टिरोस्कोपी से ऑपरेशन होगा आसान जैसे शीर्षक से सहमत हूं, क्योंकि ऑपरेशन सब लोग समझते हैं। हिस्टेरोस्कोपी का अनुवाद शायद हिस्टेरोस्कोपी से भी कठिन हो जाए। लेकिन संसद तो एक लोकप्रिय शब्द है, प्रधानमंत्री भी। पिछले दिनों दिल्ली के एक अखबार में मैंने संसद की जगह पार्लियामेंट और प्रधानमंत्री की जगह प्राइम मिनिस्टर लिखा देखा। एक नहीं अनेक बार। साधारण पढ़ा-लिखा पाठक भी संसद और प्रधानमंत्री जैसे शब्द समझ सकता है। इसे क्या कहें, भाषाई औदार्य या फिर अंग्रेजियत की गुलामी? अनेक ऐेसे शब्द हैं, जिनके सरल पर्यायवाची शब्द मौजूद हैं, लेकिन हिन्दी के अखबार उन शब्दों से परहेज करके उनकी जगह अंग्रेजी के शब्द ठूंसने की कोशिश कर रहे हैं। हिन्दी का रूप भी बिगाड़ रहे हैं। हिन्दी अखबारों में अब डॉक्टर्स, कलेक्टर्स, इंस्पेक्टर्स, इंजीनियर्स लिखा जा रहा है। जबकि हिन्दी में डॉक्टर का बहुवचन डॉक्टरों ही होगा। अंग्रेजी में डॉक्टर्स चलेगा। हिन्दी में शब्दों का इस्तेमाल हिन्दी की प्रकृति से होना चाहिए, लेकिन अब हिन्दी पत्रकारिता के पास अपना नया अतिवादी विवेक है। उसके आगे किसी की नहीं चलने वाली। हम केवल चिंता कर सकते हैं। जिनको सुधार करना है, उन्होंने कसम खा ली है, कि हम नहीं सुधरेंगे। सुधरना है तो तुम सुधर जाओ।
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कहीं कहा है कि जो भाषा गांव में, नगर में, घर में, सभा- समाज में और राज- दरबार में सब कहीं, काम आती है, वही देश- व्यापक भाषा है। इस वाक्य के बरक्स हिन्दी को देखें तो वह इस वक्त राष्ट्रभाषा की पूरी पात्रता रखती है। खैर यह तो बाद की बात है फिलहाल हिन्दी के जनसंचार माध्यम को तो यह बात समझ में आए, जो हिन्दी की रोटी खा कर अंग्रेजी की पालकी ढोने पर उतारू हैं। रेल, ट्रेन, स्कूल, बैंक जैसे शब्दों पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन दोपहर के भोजन की जगह मिड डे मील, स्वस्थ शिशु की जगह हेल्दी बेबी, केंद्रीय समिति की जगह सेंट्रल कमेटी पर चिंता होती है। आखिर ग्रामीण परिवेश वाला पाठक क्या मिड डे मील जैसे शब्द को आसानी से पचा सकता है? जब हिन्दी के पास सरल शब्दावली मौजूद है तो अंग्रेजी का सहारा क्यों लिया जाए? हां, जिन शब्दों के पर्यायवाची हमारे पास नहीं है और जिनके कारण सम्प्रेषण में दिक्कत आ सकती है, ऐसे शब्दों को लेने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। उसे हम सहर्ष लेंगे ही। जैसे बैंक, पोस्ट ऑफिस, रेल, ट्रेन, कलेक्टर से लेकर नए शब्द कम्प्यूटर, माउस, इंटरनेट आदि हमारे अपने शब्द ही नहीं हैं। ये बाहर से आए हैं। इन्हें हमने एक प्रचलित व्यवस्था के तहत स्वीकार ही कर लिया है। मीडिया में हो चाहे जीवन में। हमें इतना उदार तो होना ही होगा। वैसे पोस्ट ऑफिस का हिन्दी अनुवाद डाक घर प्यारा लगता है। यह सरल भी है। इसे प्रचलन में लाना चाहिए।
इंटरनेट के लिए अंतरजाल भी अच्छा है। एक भाषा तभी तो समृद्ध होगी जब वह नए-नए शब्द गढ़ेगी और उसका प्रचलन भी बढ़ेगा। वरना नए-नए शब्द तो केवल शब्दकोशों की शोभा बन कर ही रह जाएंगे और हम लोग चलाते रहेंगे अंग्रेजी से काम। किसे क्या फर्क पड़ता है, लेकिन दूरगामी नतीजे सामने आते हैं। जैसा हिन्दी के साथ हो रहा है वैसा व्यवहार दुनिया की किसी भी भाषा के साथ नहीं हो रहा। वैसे अंग्रेजी का प्रभाव अन्य भारतीय भाषाओं पर भी पडऩे लगा है, लेकिन वहां इतनी बुरी हालत नहीं है, जितनी हिन्दी प्रदेश में है। यहां सवाल केवल हिन्दी का ही नहीं है, वरन अन्य भारतीय भाषाओं की अस्मिता का भी है।
हिन्दी जनसंचार माध्यम अपने दोनों मोर्चों पर अंग्रेजियत का गुलाम होता जा रहा है। भाषा और व्यवहार दोनों स्तर पर। अनेक समाचार पत्रों में 'पेज थ्री' जैसे पृष्ठों पर नग्नता परोसने का सिलसिला-सा बन गया है। हिन्दी पत्रकारिता को अब अश्लीलता से परहेज ही नहीं रहा। इसीलिए खबरे भी अश्लील और चित्र भी अश्लील। यानी हिन्दी पत्रकारिता सामाजिक संरचना को विद्रूप तो कर ही रही है, वहीं भाषा को भी विद्रूपता का शिकार बना रही है। यह विकास नहीं, विनाश ही है।
इसे गहराई से समझने की जरूरत है। पत्रकारिता रंगीन तो बने, लेकिन वह रंगीन मिजाज न बने। मिशन की तरह काम करने वाली पत्रकारिता वैसे तो कमीशन तक जा पहुंची है, लेकिन अब वह भाषा के स्तर पर एक नए मिशन की ओर चल पड़ी है और वह मिशन है हिंग्लिश या हिंगरेजी। इस सोच को समकालीन हिन्दी पत्रकारिता प्रगति के सोपान समझने की भूल कर रही है, जबकि यह ऐसा सोपान है जिस पर चल कर एक भाषा अपने स्वरूप को खो रही है।
हिन्दी पत्रकारिता का वर्तमान दौर भाषाई हीनता का शिकार है। अंग्रेजी से उसका लगाव हद पार कर रहा है। केवल भारत में ही अंग्रेजी के प्रति यह दीवानगी देखने को मिलती है। माना कि हम अंग्रेज और अंग्रेजी के गुलाम रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं, कि हम आजाद होने के बावजूद उस अंग्रेजियत से मुक्त ही न हो पाएं। पत्रकारिता समाज को सूचित करती है वह शिक्षित भी करने की कोशिश करती है। लेकिन पिछले एक दशक से देखा जा रहा है, कि हिन्दी पत्रकारिता बाजारवाद की चपेट में है। वह अंग्रेजी को बाजार का हिस्सा समझ रही है। जबकि उसके अधिकांश पाठक आज भी हिन्दी वाले हंै। गांव के हैं। दिल्ली की तथाकथित राष्ट्रीय पत्रकारिता जब से दिग्भ्रमित हुई और अंग्रेजी की गोद में जा बैठी है, तब से छोटे-छोटे शहरों के समाचार पत्र भी उसी भेड़ चाल के शिकार हैं। लगभग वैसे ही शीर्षक, वैसे ही समाचार सारे अखबारों में नजर आने लगे हैं। क्या इसी का नाम वैश्विकता या ग्लोबलाइजेशन है? अगर हां, तो कम से कम मेरे जैसा पाठक इससे कतई इत्तफाक नहीं रखता और वह पत्रकारिता में भाषा की शुद्धता और विचारों की पवित्रता को ही अब तक मिशन मान कर चलना पसंद करता है।
कांतिकुमार जैन बिल्कुल ठीक फरमाते हैं कि रक्तचाप को जैसे साइलेंट किलर कहा जाता है वैसे ही हिन्दी के संदर्भ में अंग्रेजी को हम साइलेंट चेंजर कह सकते हैं। मैं भी अकसर कहता हूं, कि जीवंत भाषाएं उदारता के रथ पर सवार हो कर चलती हंै, लेकिन यह उदारता अपनी मां को बेदखल करके दूसरे की मां को स्थापित करने की इजाजत नहीं दे सकती। हिन्दी के जनसंचार माध्यम इस वक्त अपनी मां की उपेक्षा कर रहे हैं और पराई मां से ज्यादा लाड़-प्यार दिखा रहे हैं। जबकि होना यह चाहिए कि अपनी मां का सम्मान बनाए रखते हुए हम दूसरे की मां का भी सम्मान करें। हर भाषा प्यारी है, लेकिन जब बात राष्ट्रभाषा और अपनी मां की अस्मिता की आएगी, तो हमें विचार-मंथन करना ही होगा। हिन्दी का सवाल केवल कुछ लोगों का सवाल नहीं है, यह समूचे राष्ट्र की पहचान का भी सवाल है। जो अपनी स्वतंत्रता के बाद से अब तक अनेकानेक संक्रमणों से गुजरता जा रहा है। फिर चाहे वह भाषा का संकट हो, चाहे विचार का संकट या कुछ और। क्या हम ये सारा संक्रमण देखते रहेंगे? इसी प्रत्याशा में कि बाजार के दबाव के कारण चलने वाला हिन्दी जनसंचार माध्यम का ये हिंगरेजी-एपिसोड एक दिन तो खत्म होगा और फिर ब्रेक के बाद जो एपिसोड उर्फ धारावाहिक शुुरू होगा, वह विशुद्ध हिन्दी का ही होगा? या फिर ऐसी हिन्दी का होगा, जिसमें अंग्रेजी तो समाहित रहेगी, मगर अंग्रेजियत बिल्कुल नहीं। मैं आशावादी भी हूं। हो सकता है कल हम जनसंचार माध्यम में एक नई हिन्दी के दर्शन भी करें लेकिन अभी जो स्वरूप दिख रहा है, वह आश्वस्ति कारक तो नहीं है।
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गिरीश पंक रायपुर में रहते हैं। वे भारतीय एवं विश्व साहित्य की अनुवाद- पत्रिका सद्भावना दर्पण के प्रकाशन के साथ बच्चों के लिए बालहित का संपादन- संचालन बरसों से कर रहे हैं। वे पिछले 35वर्षों से साहित्य एवं पत्रकारिता में समान रूप से सक्रिय हैं। उनकी 32 पुस्तकें जिसमें 3 व्यंग्य- उपन्यास, 8 व्यंग्य संग्रह, 14 किताबें नवसाक्षरों के लिए, 4 बच्चों के लिए तथा एक हास्य चालीसा व गज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं। वे साहित्य अकादेमी दिल्ली के सदस्य हैं। उनका पता है - जी-31, नया पंचशील नगर, रायपुर-492001,मोबाइल- 094252-12720 ईमेल- girishpankaj1@gmail.com

September 22, 2010

जहां संकट मुक्ति के लिए मकबरे में मारे जाते हैं पांच जूते

करीब 500 साल पुराना यह मकबरा एक सुनसान जगह पर है, वहां आस-पास आबादी नहीं है। वह चारो तरफ से ऊंची नक्काशीदार दीवारों से घिरा है लेकिन ऊपर छत नहीं है।
विश्वास कहिए या अंधविश्वास पर उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के एक मकबरे में अपनी जियारत के लिए लोग चप्पल- जूतों का इस्तेमाल करते हैं। यहां आने वाले जायरीन (श्रद्धालु) चप्पल- जूतों से मकबरे में बनी कब्र को पीटते हैं। इटावा के बाहरी इलाके दतवली में स्थित 'चुगलची का मकबरा' में जियारत का यह अनोखा तरीका सैकड़ों वर्षो से यहां चली आ रही है। और अब यह एक परंपरा बन गई है। इसके पीछे लोगों की मान्यता है कि इस अनोखी जियारत के जरिए वे सभी संकटों से मुक्त रहेंगे। करीब 500 साल पुराना यह मकबरा एक सुनसान जगह पर है, वहां आस-पास आबादी नहीं है। वह चारो तरफ से ऊंची नक्काशीदार दीवारों से घिरा है लेकिन ऊपर छत नहीं है। स्थानीय निवासी 71 वर्षीय ललई यादव कहते हैं- 'जब भी मैं इस रास्ते से गुजरता हूं तो रूककर चुगलची के मकबरे में पांच जूते मारता हूं। उनका दृढ़ विश्वास है कि ऐसा करने से बाधाएं टल जाती हैं। लोग यह भी कहते हैं कि जो व्यक्ति लगातार एक महीने तक नियमित रोज मकबरे पर जाकर जूते- चप्पलों से पिटाई करता है, उसके साथ- साथ उसके परिवार का भाग्य भी अच्छा हो जाता है।'
मकबरे में बनी कब्र पर जूते मारने की इस परंपरा के पीछे एक कहानी भी प्रचलित है। यहां के निवासी 72 वर्षीय जगदेव शाक्य ने बताया कि इटावा रियासत के राजा सुमेर सिंह के यहां एक भोलू सईद नाम का कर्मचारी हुआ करता था। वह एक बार निकटवर्ती राज्य मध्य प्रदेश की भिण्ड रियासत घूमने गया उस समय भिण्ड और इटावा के मध्य अच्छे राजनैतिक सम्बन्ध थे। बकौल शाक्य- भोलू ने रातों-रात धनवान बनने की चाह में भिंड के राजा के मन में वैमनस्यता के ऐसे बीज बो दिए जिसके बाद दोनों राजाओं के बीच युद्ध छिड़ गया और बहुत बड़े पैमाने पर लोग मारे गए। बाद में राजा सुमेर ने युद्ध के कारणों की समीक्षा की तो चुगलखोर की करतूत सामने आई। उन्हें यह भी पता चला कि वह आस-पास की दूसरी रियासतों के राजाओं के कान भरके उन्हें सेना से जुड़ी गुप्त सूचनाएं भेज रहा है।
एक और सज्जन वकील सिंह ने बताया कि राजा ने अपने अधिकारियों से चुगलखोरी के लिए सजा के तौर पर भोलू को जूतों से पीट- पीट कर मारने का आदेश दिया। बाद में भोलू को रियासत के बाहरी इलाके में दफना दिया गया। राजा के निर्देश पर भोलू का मकबरा बनावाया गया। राजा ने फरमान जारी किया जो भी उस रास्ते से गुजरेगा मकबरे में बनी कब्र पर पांच जूते मारेगा। इसके बाद से सिलसिला चल पड़ा जो आज भी जारी है।

उमा:जिसने अपने गांव में अनूठा बदलाव गढ़ा

- नीता लाल
चटक साड़ी, मांग में सिंदूर भरे यह सरपंच कहती हैं 'जब 1989 में शादी के बाद इस गांवमें आई तो मुझे बहुत शर्म आती थी और लोगों से बात करना भी कठिन लगता था।
महिला आरक्षण बिल पर इतने गहरे चिड़चिड़ेपन के बावजूद, इस बात के चमकते हुए भरपूर उदाहरण हैं कि कोटा प्रणाली कैसे भारत की जेंडर असमान राजनीतिक भूदृश्य की तिरछी तस्वीर को सीधा कर सकती है और संपूर्ण समुदाय के जीवन को बदल सकती है। भारतीय संविधान के 73वें संशोधन ने 1992 में महिलाओं के लिए पंचायती राज संस्थाओं (पी.आर.आई.) समेत स्थानीय प्रशासन में 33 प्रतिशत आरक्षण का आदेश दिया। इसके परिणामस्वरूप स्थानीय स्तर पर महिलाओं की भागीदारी में उत्तरोत्तर बढ़ोतरी हुई। अगस्त 2008 में पंचायती राज मंत्रालय के एक अध्ययन के अनुसार 27.8 लाख पंचायत प्रतिनिधियों में से 10.4 लाख महिलाएं हैं। सरकार द्वारा पिछले साल पंचायती राज स्तर पर महिलाओं के आरक्षण को बढ़ा कर 50 प्रतिशत करने के साथ संख्या और भी बढ़ जाएगी।
हालांकि इस परिवर्तन के बावजूद किस प्रकार निर्वाचित 'सरपंच' और 'प्रधानों' को परेशान किया जाता है और कमजोर बनाया जाता है, ऐसी असंख्य रिपोर्टें आती हैं। लेकिन इसके साथ- साथ, जमीनी स्तर पर महिलाओं के सशक्तिकरण की असंख्य प्रेरणादायक कहानियां भी हैं।
हाल ही में सोसायटी फॉर पार्टिसिपेट्री रिसर्च (पीआरआईए) द्वारा नई दिल्ली में 'पंचायतों में महिला नेतृत्व का मजबूतीकरण' शीर्षक से आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में त्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, उत्तराखण्ड, महाराष्ट्र और गुजरात से करीब 75 पंचायत के निर्वाचित प्रतिनिधि अपने गांवों में विकास की चुनौतियों को संबोधित करने के अपने हजारों अनुभव एक दूसरे के साथ बांटने के लिए एकत्र हुए थे। जैसे- जैसे चर्चा हुई यह स्पष्ट हो गया कि अधिकांश मामलों में 'सरपंच' होना इन महिलाओं के लिए एक बहुत बड़ी बात थी। लेकिन, छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में 1,250 सशक्त गांव सिहा की 40 वर्षीय सरपंच उमा साव की कहानी सबसे अधिक सराहने और अनुकरण के योग्य थी। उच्च जाति के 'घानी' समुदाय की होने के बावजूद आठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोडऩे वाली उमा की रोज की चिंता सिर्फ अपने चारों बच्चों की देखभाल और परिवार के लिए क्या खाना बनाना है इसी के इर्द- गिर्द घूमती थी। चटक साड़ी, मांग में सिंदूर भरे यह सरपंच कहती हैं 'जब 1989 में शादी के बाद इस गांव में आई तो मुझे बहुत शर्म आती थी और लोगों से बात करना भी कठिन लगता था। लेकिन अंतर्मन में हमेशा से समुदाय के लक्ष्यों- जैसे गांव के पर्यावरण को बेहतर बनाना, खराब सड़कों को सुधारना, स्कूल और शौचालय बनवाने के लिए काम करने की इच्छा थी' लेकिन फिर भी उमा ने कल्पना नहीं की थी कि एक दिन वह इन लक्ष्यों को पूरा करने में अपने गांव की अगुवाई करेगी। हां काफी अच्छे शगुन थे- गांववालों के साथ उमा का सौहाद्र्र, समुदाय की समस्याओं के लिए व्यवहारिक दृष्टिकोण और सखी- समाज का बोध जो वे गांव की महिलाओं के अंदर पैदा कर पाईं। इन गुणों के आधार पर उमा को गांव की महिलाओं से स्थानीय पंचायत का चुनाव लडऩे के लिए प्रोत्साहन मिला।
वे कहती हैं, 'मैंने सोचा जब लोगों को मुझ पर इतना विश्वास है तो क्यों राजनीति में हाथ आजमाया जाए?' पहले राजनीति का कोई अनुभव और चुनाव लडऩे में कभी कोई रुचि, ऐसे में उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं था। जब 2005 में सरकार ने सिहा गांव को महिला आरक्षित सीट निश्चित किया तो अपने परिवार के आशीर्वाद से उमा सरपंच बन गईं, और इस तरह सिहा गांव का परिवर्तन शुरू हुआ। शुरू में उमा ने क्रमबद्ध तरीके से गांव की मुख्य समस्याओं की पहचान की। पीने का पानी, सफाई सेवाएं, स्वच्छता, शिक्षा, गांव के तालाब का सूखना और सड़कों के निर्माण को प्राथमिकता के तौर पर रेखांकित किया। इसके बाद पंचायत संचालन से आंतरिक रूप से जुड़े अन्य मुद्दे थे- जैसे लोगों का ग्राम सभा की बैठकों में आना और पुरुषों का सदस्यों को डरा कर निर्णयों को प्रभावित करने की कोशिश करना।
जब उमा सरपंच बनीं, इस बात का कोई संकेत नहीं था कि वे प्रेरणादायक भूमिका लेंगी। हालांकि ग्राम सभा बैठक का लिखित ब्यौरा दर्शाता है कि कैसे इस बहादुर महिला ने सिहा गांव में अनूठा बदलाव गढ़ा। वे सरपंच भवन, पक्की सड़कें, 200 शौचालय और स्थानीय स्कूल के लिए बाहरी दीवार बनाने में सफल रहीं। उन्होंने सड़क की लाइटें, ट्यूबवेल परिवारों में पानी की टंकियां और नल लगवाना भी सुनिश्चित किया। अब वहां ढंके नालों, नेटवर्क और भलीभांति काम करती सार्वजनिक वितरण प्रणाली मौजूद है।
उमा के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण योगदान क्या हैं?
उनके अनुसार महत्वपूर्ण यहां स्कूलों में स्वस्थ मिड-डे भोजन का समय और वृद्धावस्था पेंशन पाने की प्रक्रिया को सरल बनाना है। वे कहती हैं, 'बच्चे और वृद्ध स्वस्थ समुदाय का आईना होते हैं इसलिए मैंने इन लक्ष्यों की ओर जानबूझ कर काम किया है। इसके अलावा, मैं गर्व से कह सकती हूं कि आज मेरे गांव के हर परिवार में शौचालय है!' शिक्षा और मिड-डे भोजन के प्रभावशाली संचालन के अतिरिक्त उमा ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एम.जी.एन.आर..जी..) के अंतर्गत गांव के तालाब को गहरा करने के लिए भी इंतजाम कर दिया है।
इन सब कार्यों में बाधाएं?
'सरपंच' के अनुसार काम करना मुख्यत: वित्तीय मजबूरियों के कारण मुश्किल है। उन्हें पंचायत फंड से प्रति वर्ष 40,000 रुपयों की राशि आवंटित की गई है। इसका मतलब है अति आवश्यक काम अक्सर पीछे रह जाता है, या लम्बे समय तक डगमगाता रहता है। उमा को पंचायत में कोरम सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष और गांव के पुरुषों तथा पंचायत के अन्य सदस्यों की गर्म- मिजाजी का सामना करना पड़ा। उसके परिवार और पति मल्लू सिंह, जो एक किसान हैं, पर विरोधी दल द्वारा रुक- रुक कर हमले होते रहे। कई सारे पुरुष प्रत्याशियों द्वारा उनके विरुद्ध गुट बनाने और निंदा अभियान शुरू करने के साथ उनके सामने परेशानियां कम नहीं थीं। उमा स्पष्ट कहती हैं 'पराजित प्रत्याशियों और महिला विरोधी सरपंच ने अक्सर मेरे परिवार को डराने की कोशिश की' 'मेरे पति पर तो हमला भी हुआ' जब उमा ने जिला कलेक्टर से शिकायत की उसका कोई ज्यादा प्रभाव नहीं हुआ। दुर्भाग्य की बात है जब भी उनका तालमेल जिला कलेक्टर से अच्छा बनता, उनके तबादले का समय हो जाता। फिर भी, दबाव के आगे झुकने के बजाय, सरपंच ने एक मजबूत समुदायिक आधार बनाया है और वे दृढ़ निश्चय के साथ बहादुरी और मेहनत की अनुकरणीय कहानी लिखती चली गईं।
उन्हें यह शक्ति कहां से मिली?
उमा कहती हैं कि उन्हें अपनी शक्ति चुनौतियों और अपने परिवार के समर्थन से मिलती है। वे कहती हैं, एक मददगार पति ने उन्हें अर्थपूर्ण सामाजिक परिवर्तन आरंभ करने के गुण को समझने में सहायता की। यह उत्साही महिला कहती है 'साथ ही, मैं एन.जी.. के साथ काम करती हूं, जो एम.जी.एन.आर..जी.. जैसी सरकारी योजनाओं और सूचना के अधिकार को कैसे इस्तेमाल करते हैं के बारे में मेरे ज्ञान में वृद्धि करते हैं।'
क्या उन्हें लगता है कि यह सब करने का कोई महत्व है?
उमा निडरता से कहती हैं, 'बिल्कुल'! धमकियों और हमलों के बावजूद? वे दोहराती हैं, 'अगर इन हरकतों से वो मुझे तोड़ पाए तो इससे अन्य महिलाओं के लिए एक बुरा उदाहरण होगा'
वे भ्रष्टाचार से कैसे निपटती हैं, जो कि अक्सर ग्राम पंचायतों में एक अति महत्वपूर्ण समस्या है? क्या वे रिसर्च परिणामों में विश्वास करती हैं जिनका दावा है कि महिला प्रतिनिधि एक स्वतंत्र तरीके से काम करती है और भ्रष्टाचार की संभावनाएं उनके सामने खत्म हो जाती हैं?
जवाब में उमा के पास एक अनूठा परिप्रेक्ष्य है। वे कहती हैं, 'एक महिला का ध्यान गबन करने पर नहीं बल्कि पैसे को सोच- समझकर खर्च करने पर होता है। हमें घर पर ऐसा करने की आदत होती है और हम सीमित साधनों में भी अच्छी तरह काम चला लेती हैं। हम उद्घाटन और मनोरंजन जैसे फालतू कार्यक्रमों पर खर्च से बच कर इसका प्रयोग कुशलता के साथ गांव के विकास में करते हैं।' चाहे आप इसे नारीवाद का पैदाइशी ज्ञान कहें लेकिन इसने इस सरपंच को आज वो जहां है वहां पहुंचने में जरूर मदद की है। कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि उमा ने विकास के घोषणा- पत्र पर अपनी जीत का डंका 2009 में भी बजाया। इस बार एक स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में और स्वयं की पढ़ाई छूटने के बाद भी, इस बात का पूरा ध्यान रखा कि उसके चारो बच्चों की पढ़ाई छूटे। उनका बड़ा बेटा रायगढ़ के कालेज में इंजीनियरिंग पढ़ रहा है, जबकि बाकी तीन बेटे स्थानीय स्कूल में पढ़ रहे हैं। हां, उसी स्कूल में जिसको उनकी मां ने दीवारों और जाते रंग से मजबूत बनाया है।
(विमेन्स फीचर सर्विस)

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