March 21, 2009

पर्यावरण की होली न जलाएं


- सुजाता साहा
एक दिन की मौज- मस्ती के लिए हम कितना
नुकसान कर रहे हैं इसका अंदाजा है ?

पिछले वर्ष की बात है मैं होली के दो दिन पहले बाजार गई थी मुझे नहीं पता था कि उस इलाके में दो दिन पहले से ही सड़कों पर लोग होली खेलने निकल आते हैं। मैं स्कूटी से घर लौट रही थी तभी पीछे से कुछ शरारती लड़कों ने रंगों से भरा गुब्बारा मेरी ओर फेंका जिससे मेरा सफेद टी शर्ट रंगीन हो गई। होली के दिन रंग गुलाल से खेलना सबको अच्छा लगता है पर बीच सड़क पर इस तरह किसी जरुरी काम से जाते हुए लोगों पर रंग फेंकना कैसे अच्छा लग सकता है। ऐसे में किसे गुस्सा नहीं आएगा। होली की ऐसी शुरुआत हो जाए तो त्यौहार का सारा उत्साह खत्म हो जाता है।

आपको भी इस तरह के कुछ कटु अनुभवों से गुजरना पड़ा होगा, जिसने आपके भी इस रंग- बिरंगे त्योहार का मजा ही किरकिरा कर दिया होगा। दरअसल समय के साथ-साथ होली मनाने के ढंग में ढेरों बुराईयां आ गई हैं। दोस्ती की जगह दुश्मनी ने ले ली है। असभ्य लोग गुलाल और रंगों की जगह कीचड़, गोबर, मिट्टी, वार्निश जैसे कई खतरनाक रासायनिक रंगों का प्रयोग करने लगे हैं। कुछ लोगों ने होली के दिन हंसी ठिठोली करते हुए रंजोगम को भूल कर उल्लास के साथ मनाने की बजाय गंदे तथा अश्लील हंसी-मजाक के साथ अजब-गजब टाइटल देकर अपने मन की भड़ास निकालने का त्योहार बना दिया है।

रंगों से सराबोर हो जाने वाले त्योहार का सबसे दुखदाई पहलू यह है जब होली जलाने के नाम पर हम अपने पर्यावरण को नष्ट करने पर तुले होते हैं। वैसे तो हमारे देश में पर्यावरण बचाने के लिए हजारो स्लोगन बनाए गए हैं। वृक्ष बचाओ, जल बचाओ। लेकिन होलिका दहन के नाम पर हरे-भरे वृक्षों को काटकर आग की भेंट चढ़ा कर हम किस तरह हम अपने अंदर छुपी बुराईयों को जला पा रहे हैं यह सोचने वाली बात है। राह में पेड़ों को कटते देख कर व्यवस्था को गाली देते हुए निकल तो जाते हैं, पर उस कटते हुए पेड़ को बचाने के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाने के बारे में कभी नहीं सोचते। भले ही सरकार को कोसते हैं कि देखो कैसे अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे चुपचाप पेड़ को कटते हुए देख रहे हैं।

एक दिन की मौज- मस्ती के लिए हम कितना नुकसान कर रहे हैं इसका सबको अंदाजा है पर नहीं फिर भी हम तो भई रंग के नाम पर गैलनों पानी बहायेंगे ही चाहे तो कल को पीने को पानी ही न मिले। सवाल यह है कि क्या पेड़ों को, पानी को बचाने का काम सिर्फ सरकार का है? इन बुराईयों को मिटाने में हम और आप क्यों कोई पहल नहीं करते?

अपनी-अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराने का ही नतीजा है कि इन हुडंदंगियों की वजह से पिछले कुछ वर्षों से शहरों में यह त्यौहार सन्नाटे का त्यौहार बन गया है। आइए हम सब मिलकर इस सन्नाटे को तोड़ें और आनंद के इस रंग में पर्यावरण की होली न जलाए।

Email- sujatasaha11@rediffmail.com

0 Comments:

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष